मेरी सुनो प्रभु जैसे सबका दुःख निवारा
अजामील गणिका प्रहलाद को उबारा
जनक जानकी की सोच धनुष तोड़ डाला
मेरी सुनो प्रभु जैसे सबका दुःख निवारा
विभीषण को शरण देत रावण को मारा
भई ग्लानि आये शरण हारी प्रीति हारा
मेरी सुनो प्रभु जैसे सबका दुःख निवारा
अंत काम कोई न आये नज़र भर निहारा
सती वृंदा को एक नाथ तेरा ही सहारा
मेरी सुनो प्रभु जैसे सबका दुःख निवारा
ये भजन मुझे आदरणीया मौसी श्रीमती आशा ठक्कर (इंदौर) एवं श्रीमती निशा शर्मा (खंडवा) के माध्यम से ज्ञात हुआ |
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